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Best CTET Hindi notes 2020 for prepration

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बालमनोवैज्ञानिक जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत ( for examination )

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत


जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत :-

     स्वीटजरलैंड के मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे संज्ञानात्मक विकास के क्षेत्र में अकेले व्यक्ति हैं , जिन्होंने 50 वर्षो से अधिक समय तक बच्चों के व्यवहार का सुक्ष्मतापूर्वक प्रेक्षण और विश्लेषण करते रहने के बाद संज्ञानात्मक विकास की अवधारणा से सम्बन्धित नियमो और सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।

संज्ञानात्मक विकास की अवधारणा :-

      " संज्ञानात्मक विकास उन मानसिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित है जिसके द्वारा व्यक्ति उद्दीपकों के विषय में ज्ञान प्राप्त करता है अथवा अपने परिवेश को जान पाता है । 
      " संज्ञानात्मक विकास का मुख्य तत्व संज्ञान है । कल्पना , तर्क , चिन्तन ,प्रत्यक्षीकरण आदि संज्ञानात्मक क्रियाएँ बौद्धिक क्षमता के विकास के लिए आधार का काम करती है इन क्रियाओं के कारण ही बालक में संज्ञानात्मक क्षमता का विकास होता है ।

संज्ञानात्मक विकास के संम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों का दृष्टिकोण :-

     बालक में संज्ञानात्मक क्षमता का विकास कैसे होता है- इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के दो दृष्टिकोण है -

1- साहचर्यवादियों का दृष्टिकोण    :-

     वे मानते है कि बालकों में संज्ञानात्मक संरचना का निर्माण विभिन्न अनुभवों के साहचर्य के कारण होता है । बालक अनुभव में जाने वाले तथ्य एक साथ जुटते रहते हैं जिससे उसके भीतर एक ज्ञान का भण्डार या संज्ञानात्मक संरचना विकसित हो जाती है ।

2 - विकासात्मक दृष्टिकोण 

      जिसके प्रतिपादक संज्ञानात्मक विकास के मुख्य प्रेरक जीन पियाजे है । विकासात्मक दृष्टिकोण के अनुसार बालक के भीतर जो जन्मजात क्षमताएँ होती हैं उन्हीं के सहायता से वह अपने विकास क्रम में बाह्य जगत से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त करता है । 

【विकास की अवधारणा】

संज्ञानात्मक क्षमता के विकास के मुख्य लक्षण :-

1- तार्किक चिन्तन की योग्यता का विकास और 
2- सक्षमता का विकास 
     प्रारम्भ में बालक अतार्किक चिन्तन की स्थिति में होता है परन्तु जैसे जैसे उसमें संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का विकास होता जाता है उसका चिन्तन तार्किक होता जाता है। बालक की यह विशेषता सक्षमता की विशेषता कहलाती है । यदि तार्किक चिन्तन के कारण बालक को व्यवस्था , व्यवहार , मानदण्डों मूल्यों नियमों आदि की जानकारी प्राप्त होती है तो सक्षमता के विकास के द्वारा उसके अन्दर अपने वातावरण के साथ समायोजन स्थापित करने की क्षमता विकसित होती है ।

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धात :-

     जीन पियाजे ने तर्क , विचार , चिन्तन , नैतिक निर्णय , प्रत्यय - बोध जैसे अछूते मनोवैज्ञानिक तथ्यों के क्रमिक विकास का बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया और अपने विचारों को उन्होंने सन् 1923 में अपनी सर्वप्रथम पुस्तक " दी लैंगुएज ऑफ दी थाट ऑफ दी चाइल्ड ' ( The Language of the Thought of the Child ) में प्रकाशित की । जीन पियाजे की मनोवैज्ञानिक विचारधाराओं को 'विकासात्मक मनोविज्ञान ' के नाम से भी जाना जाता है ।

     मानव विकास के परम्परागत सिद्धान्तों के अनुसार मानव विकास के तीन पहलू होते हैं 

1. जैविकीय परिपक्वता
2. भौतिक वातावरण के साथ अनुभव
3. सामाजिक वातावरण के साथ अनुभव
     जीन पियाजे ने मानव विकास के इन सिद्धान्तों में अपना एक नया सिद्धान्त "सन्तुलनीकरण का सिद्धांत" जोड़ा ।

सन्तुलनीकरण का सिद्धांत  :-

     सन्तुलनीकरण विकास के अन्य तीनों सिद्धान्तों के मध्य समन्वय भी स्थापित करता है ।
     पियाजे के अनुसार - "सन्तुलनीकरण एक स्वसंचालित उन्नतोन्मुख प्रक्रिया है ।" 
     पियाजे ने मानव विकास के सामान्य तथ्यों की चर्चा के मध्य ही सन्तुलनीकरण को स्पष्ट करने के लिए दो अन्य प्रत्यय भी दिए 
1. आत्मीकरण  
2. अनुकूलन

आत्मीकरण प्रत्यय :-

     आत्मीकरण से तात्पर्य पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्मित पृष्ठभूमि से है । इसका तात्पर्य वातावरण से प्राप्त ज्ञान के साथ-साथ उन पूर्व अनुभवों से भी है जो वर्तमान वातावरण से ज्ञान प्राप्त करने में सहायक होते हैं ।
     "नवीन जानकारी को अपनाने के लिए वर्तमान अवधारणा में बदलाव की प्रक्रिया " आत्मसात्करण" कहलाती है" ।

अनुकूलन प्रत्यय :-

     अनुकूलन एक प्रकार से समंजन की क्रिया है । बालक वातावरण के ज्ञानार्जन के साथ - साथ वातावरण के साथ समायोजन भी स्थापित करना चाहता है। यह समायोजन ही सन्तुलनीकरण है और वातावरण के साथ यह समायोजन प्रक्रिया मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के लिए एक अनिवार्यता है। 

संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं :-

     विभिन्न अवस्थाओं में संज्ञानात्मक विकास बालक या बालिकाओं मे सभी स्तरों पर एक समान न होकर भिन्न भिन्न होता है । इस भिन्नता के आधार पर पियाजे ने बालकों के संज्ञानात्मक विकास को निम्नलिखित चार अवस्थाओं में विभक्त किया हैं 

1 - संवेदीगत्यात्मक अनुकूलन की अवस्था ( 0-2 वर्ष )

       या ● संवेदी पेशीय अवस्था
       या ● इन्द्रिय जनित गामक अवस्था

2 - पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( 2 - 7 वर्ष )

      या ● प्राक संमप्रत्यातमक अवस्था
      या ● अंतर्दर्शी (अन्तः प्रजात्मक विचार की अवस्था)

3 - स्थूल कार्यात्मक अवस्था ( 7 - 12 वर्ष )

      या ● मूर्त संक्रिया की अवस्था

4 - औपचारिक कार्यात्मक की अवस्था (12 - 18 वर्ष )

      या ● अमूर्त संक्रिया की अवस्था


     सभी अवस्थाओं में बच्चे एक निश्चित क्रम से आगे बढ़ते है । भौतिक परिपक्वता एवं पर्यावरण की भिन्नता के कारण सभी बच्चों के विकास की गति समान नहीं होती । कुछ बच्चों की विकास गति धीमी और कुछ की अपेक्षाकृत तीव्र होती है । 
     

1. संवेदी गत्यात्मक अनुकूलन की अवस्था या संवेदी पेशीय अवस्था या इन्द्रिय जनित गामक अवस्था

         ● जन्म से 2 वर्ष तक
         ● मूल व्यवहार का आरम्भ
         ● मूल प्रवृत्यात्मक क्रियाकलाप की अवस्था
     यह संज्ञानात्मक विकास की पहली अवस्था है । इस अवस्था का प्रारम्भ शिशु की सहज क्रियाओं (प्रतिवर्ती) से होता है । 
     शिशु अपनी सहज क्रियाओं और ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से ध्वनियों , वस्तुओं , गन्ध आदि का अनुभव करता है । 
     अनुभूतियों की पुनरावृत्ति होते रहने के कारण शिशु वातावरण के उद्दीपकों की उपस्थिति और उनको बाह्य विशेषताओं से धीरे धीरे परिचित हो जाता है जिससे उसमें संज्ञानात्मक आत्मीकरण और अनुकूलन या समायोजन की क्रियाएँ प्रारम्भ होती हैं । इस अवस्था का प्रमुख गुण अनुकरण , स्मृति और मानसिक निरुपण है।
     इस अवस्था में शिशु आत्मकेन्द्रित प्राणी के रूप में होता है । 

     पियाजे ने संवेदीगत्यात्मक अवस्था को पुनः छ : भागों में विभक्त किया है । 

A - सहज क्रियाओं की अवस्था ( 0 से 1 माह ) :-

    चूसना , रोना , सम्पूर्ण शारीरिक क्रियाएँ आदि करना। ( प्रतिवर्ती क्रियायें करता है )

B - प्रमुख वृत्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था ( 1 से 4 माह ) :-

     प्रतिक्रियाओं का सम्पादन करना । अब वह आत्मीकरण तथा अनुकूलन में अन्तर करने लगता है।

C -  गौण वृत्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था ( 4 से 8 माह ) :-

     उसके कार्यों में उद्देश्यपूर्णता आती है । उसकी क्रियाएँ अब किसी उद्देश्यपूर्ति के लिए होती है । ( वस्तुओं को उलटने-पलटने की क्रिया पर ध्यान केन्द्रित )

D -  गौण स्कीमेटा के समन्वय की अवस्था ( 8 से 12 माह ) :-

     यहाँ वह प्रारम्भिक और अन्य प्रतिक्रियाओं में समन्वय स्थापित करने लगता है । वह अपने उद्देश्य प्राप्ति में आई बाधाओं को दूर करना सीखता है । 

E -  तृतीय वृत्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था ( 12 से 18 ) :-

     वह साधन और साध्य में अन्तर कर साधनों के प्रयोग से साध्य प्राप्त करना चाहता है । ( प्रयास और त्रुटि विधि से सीखने का प्रयास )

F -  मानसिक संवेगो द्वारा नये साधनों के खोज की अवस्था ( 18 से 24 माह )  :-

     मानसिक शक्तियों के प्रयोग से साध्य को प्राप्त करने के लिए नवीन - साधनों का प्रयोग करना सीखता है । ( वस्तु स्थायित्व के गुण आना )

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था

        ● 2 से 7 वर्ष की अवस्था
        ● प्रारम्भिक बाल्यकाल
        ● भाषा विकास का प्रारम्भ
     संवेदीगत्यात्मक अवस्था के बाद बच्चा विचारात्मक अभिव्यक्तियों की सहायता से वातावरण से सम्बन्ध स्थापित करता है । 

     इस अवस्था को पुनः दो भागों में विभक्त किया गया है । 

1 - प्राक संप्रत्यातमक अवस्था ( 2 - 4 वर्ष ) :-

     यह बालकों के चिंतन में एक ऐसी परिसीमा बताता है जिसमें बालक निर्जीव वस्तुओं को सजीव समझता है। इसके भी दो भाग हैं :-
A - जीवावाद :- इस अवस्था में बालक सूचक ( संकेत , चिन्ह  आदि ) को विकसित कर लेता है ।
B - आत्मकेंद्रिता :- इस अवस्था में बालक मे अहम् की भावना प्रबल होती है। वह सिर्फ अपने ही विचारों को सही मानता है ।

2- अंतदर्शी ( 4 से 7 वर्ष ) :-

       ● अन्तः प्रजात्मक विचार की अवस्था 
     इस अवस्था में आकर बालक अपने पूर्व एवं वर्तमान अनुभवों के प्रत्ययों को स्थिर सामान्यीकृत रूप में प्रयोग करने के योग्य हो जाता है । उसकी तार्किकता तर्कपूर्ण नहीं होती है वह व्यवस्थित तर्क की अपेक्षा अन्त : प्रज्ञा पर आधारित होती है । बालके के अन्तः प्रजात्मक विचार मुख्यतः स्थिर रूपों से सम्बन्धित होते हैं । इस अवस्था को " पूर्व कार्यात्मक अवस्था ' भी कहते हैं । 

3. स्थूल कार्यात्मक अवस्था  :- 

             ● ( 8 से 12 वर्ष )
             ● मूर्त संक्रियात्मक अवस्था
      इस अवस्था में बालक का संज्ञान अधिक विकसित हो जाता है जिससे वह जटिल तार्किक प्रत्ययों को समझने लगता है । अब बालक अहंकेन्द्रिता से हटकर अन्य की ओर अपना ध्यान देना प्रारम्भ कर देता है । वह भार , आकार , संक्रिया और आयतन जैसे सूक्ष्म प्रत्ययों को समझने लगता है । सूक्ष्म प्रत्ययों को समझने के लिए स्थूल प्रत्ययों के ज्ञान संरक्षण की आवश्यकता होती है । इसी संरक्षण गुण के कारण बालक भार , लम्बाई , ऊँचाई , आकार तथा अन्य गणितीय एवं ज्यामितिक प्रत्ययों को समझ पाने की योग्यता का विकास करता है। इस अवस्था में बालक अमूर्त संकल्पनाओं के बिषय में चिन्तन करना प्रारम्भ कर देता है।
      पियाजे ने इस अवस्था को " स्थूलकार्यात्मका की अवस्था ' कहा है । करके सीखना  स्थूल कार्यात्मक अवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है । बालक इस अवस्था में आकर कार्यों को स्वयं सीखता है । कार्य करने के साथ ही वह कार्य - कारण सम्बन्धों को ढूँढ़ने व समझने का प्रयास करता है। लम्बे समय तक एक ही कार्य करते रहने से बालक कार्य करने के नियम बना लेता है और इस प्रकार वह "नियमीकरण" करने लगता है । यह अवस्था नियमीकरण की अवस्था कहलाती है । कालान्तर में बालक के ये नियम ही तार्किक नियम का रूप धारण कर लेते हैं और यहीं से तार्किक चिन्तन प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है परन्तु बालक का तर्क केवल स्थूल परिस्थितियों तक ही सीमित रहता है । 

     स्थूल कार्यात्मक अवस्था की तीन प्रमुख विशेषताएँ होती हैं- 

( 1 ) क्रमिक व्यवस्था 
( 2 ) वर्गीकरण और 
( 3 ) अनुरूपीकरण  
     क्रमिक व्यवस्था से तात्पर्य तथ्यों तथा विचारों को किसी एक सुनिश्चित क्रम में सजाने से है । इस अवस्था में बालक तथ्यों व विचारों को क्रम - बद्ध रूप में सजाने अथवा व्यक्त करने लगता है । 
     उदाहरणार्थ वह वस्तुओं को उनके आकार में रखना सीख जाता है । वर्गीकरण करने की योग्यता का विकास भी करीब सात - आठ वर्ष की आयु में हो जाता है । इस योग्यता का विकास होने पर बालक विभिन्न प्रकार के तथ्यों को विभिन्न विशेषताओं के आधार पर उन्हें पृथक् पृथक् वर्गों अथवा श्रेणियों में विभाजित करना सीख जाता है । जैसे - कह एक रंग अथवा आकार की वस्तुओं को एक समूह में विभक्त करने लगता है । धीरे - धीरे अनुरूपीकरण की दशा में बालक स्थूल तथ्यों से हटकर सूक्ष्म तथ्यों का भी वर्गीकरण करने लगता है । दो या अधिक तथ्यों के जोड़े बनाना सीखता है ।
 प्ररम्भ में बालक किसी एक गुण गुणों के आधार पर जोड़े बनाना सीख लेता है । इस प्रकार स्थूल कार्यात्मकता की अवस्था में आकर बालक क्रमिक अवस्था , वर्गीकरण , अनुरूपीकरण करना प्रारम्भ कर देता है । 

4. औपचारिक कार्यात्मक अवस्था :-(12-18 वर्ष)

● अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था 
● भाषा विकास का चरमोत्कर्ष 
     संज्ञानात्मक विकास की यह अवस्था अन्तिम अवस्था है । बाहर वर्ष के बालक बालिकाएँ पूर्व किशोरावस्था में होते हैं । यह चिन्तन की अवस्था कहलाती है । अब बालकों का व्यवहार अधिक व्यवस्थित हो जाता है , वे व्याख्याएँ कर सकते हैं , निष्कर्ष निकाल सकते हैं , सम्भव के विषय में विचार कर सकते हैं , परिकल्पनाओं का निर्माण कर सकते हैं और समस्या समाधान के अन्तिम परिणाम तक पहुँच सकते है । बालकों की तार्किक कुशलता का विकास इस सीमा तक हो जाता है कि वे सभी तार्किक सम्भावनाओं पर तर्क कर लेते हैं । उनका तर्क निगमनात्मक हो सकता है। 
औपचारिक कार्यात्मक अवस्था में ही बालकों में अमूर्त चिन्तन का गुण विकसित हो जाता है जो इस अवस्था की एक प्रमुख विशेषता है । 
     इस अवस्था में आकर किशोर चार प्रकार की मानसिक क्रियाएँ करना प्रारम्भ कर देता 

( 1 ) तादात्मीकरण ( Indentification ) , 
( 2 ) निषेधीकरण ( Negation ) , 
( 3 ) पारस्परिक सम्बद्धता ( Reciprocalness ) 
( 4 ) सहसम्बन्धी रूपान्तर ( Correlative transformation )

संज्ञानात्मक विकास का शैक्षिक महत्त्व :-

1. इस सिद्धांत के अनुसार बच्चे के बौद्धिक विकास हेतु उसको सिखने और सीखने की प्रक्रिया में सक्रियता के साथ संयोजित किया जाना चाहिए । 
2. शिक्षकों को अनुकरण व खेल विधी से शिक्षण कार्य करना चाहिए । 
3. इस सिद्धान्त से शिक्षकों में यह सूझ उत्पन्न होती है कि यदि किसी किशोर में औपचारिक संक्रियात्मक चिन्तन के स्तर को बढ़ाना है तो उसे अधिक ऊँचे स्तर की शिक्षा देना अनिवार्य है ।
4. इस सिद्धान्त में यह स्पष्ट रूप से बताया गया कि शिक्षा के स्तर से बालकों का औपचारिक संक्रियात्मक चिन्तन प्रभावित होता है ।
5. पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त से शिक्षकों को यह स्पष्ट रूप से निर्देश मिलता है कि वे शिक्षार्थियों को अपनी ही क्रियाओं द्वारा एक नई समझ एवं सूझ विकसित करने में उनकी मदद कैसे और कब कर सकते हैं । इसका मतलब यह हुआ कि शिक्षक को शिक्षार्थी की मदद अनावश्यक रूप से हर कदम पर नहीं कर करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उनमें स्वायत्तता तथा आत्म विश्वास जैसे गुणों का विकास नहीं होता है जो संज्ञानात्मक विकास में एक बाधक के रूप में साबित हो सकता है ।
6. पियाजे के इस सिद्धान्त ने शिक्षकों को बालकों के खेल को एक नया संदर्भ में विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है । अब भी कुछ शिक्षक खेल को शैक्षिक रूप में अधिक महत्त्वपूर्ण न मानकर मात्र मनोरंजन का एक साधन मानते हैं । परन्तु अपने इसे सिद्धान्त में यह स्पष्ट कर दिया है कि खेल का एक साधन मानते हैं । परन्तु , पियाजे ने अपने इसे सिद्धान्त में यह स्पष्ट कर दिया कि खेल का शैक्षिक महत्त्व काफी है ।  खेल के माध्यम से बालकों में संज्ञानात्मक सम्पन्नता विकसित होता है जो उनके संज्ञानात्मक विकास का एक मूल आधार बनात है ।
7. पियाजे ने अपने सिद्धान्त में शिक्षार्थी अर्थात बालक की भूमिका को काफी सक्रिय एवं महत्त्वपूर्ण माना है । इससे शिक्षकों पाठ्यक्रम तैयार करते समय शिक्षार्थी की आवश्यकता , प्रेरणा एवं अभिरुचि पर विशेष रूप से नजर रखकर कार्यक्रम तैयार करने सुविधा होती है ।
8. बच्चों को स्वयं से करके सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
9. शिक्षकों व अन्य व्यक्तियों को बच्चों की बुद्धि का मापन उनकी व्यवहारिक क्रियाओं के योग के आधार पर करना चाहिए ।
10. बालक के संज्ञानात्मक विकास के लिए एक समृद्ध और विविधतापूर्ण वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए । 

प्रमुख बिन्दु : 

छ : वर्ष की उम्र तक बच्चो में संज्ञानात्मक परिपक्वता का अभाव रहता है । 
निर्माण व खोज का सिद्धांत जीन पियाजे द्वारा प्रस्तुत किया गया । 
● भाषा विकास के सन्दर्भ में पियाजे का मत था कि ~  " भाषा पहले विचार बाद में " 
विकसात्मक बालमनोविज्ञान के जनक-'जीन पियाजे' 
● "बुद्धि एक प्रकार की अनुकूलित प्रक्रिया है, जिसमे जैविक परिपक्वता व वातावरण के साथ होने वाली अन्तःक्रियायें सम्मलित हैं।"
● "जैसे-जैसे बच्चों का संज्ञानात्मक विकास होता है वैसे-वैसे उनका बौद्धिक विकास भी होता जाता है।"

● "सामाजिक संचरण बौद्धिक विकास का नीर्धारक तत्व नही है।"

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