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Best CTET Hindi notes 2020 for prepration

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CTET Hindi notes 2020 :-  इस संस्करण मे ( CTET Hindi notes 2020 ) शिक्षक पात्रता परीक्षा को ध्यान मे रखते हुए हिन्दी विषय से जुड़े सारे पाठ्यक्रम को सुनियोजित एवं क्रमबद्ध तरीके से संकलित किया गया है । CTET Hindi notes 2020 ( Why is it important ) :-  परीक्षा की दृष्टि से किसी भी विषय की तैयारी के लिए आवश्यक है एक उचित माध्यम, जहाँ विषय सम्बन्धित सभी तथ्य व महत्वपूर्ण बिन्दु मिल सके एवं उनकी तैयारी सरल व सहज तरीक़े से हो सके B. B. Education ( CTET Hindi notse 2020  के माध्यम से) आपकी इन्हीं आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए वचनबद्ध है। CTET Hindi notes 2020 ( What is in it ) :- B.B. Education द्वारा तैयार किये गये सारे CTET Hindi notes 2020  व्यक्तिगत अनुभव, छात्र, शिक्षक, पाठ्यक्रम, एवं महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान मे रखकर बनाया गया है ।इसमें Hindi Pedagogy, Hindi language, and NCERT Class notes को आसान एवं सरल तरीक़े से बताया एवं समझाया गया है। CTET Hindi notes 2020 ( Specialty ) :- Previous year exam के प्रशनों को अलग - अलग कर उसे अध्यायवार सम्मलित किया गया है ।             जैसे :-

विकास की अवधारणा-(बाल विकास, विकास के सिद्धांत, अभिवृद्धि, आनुवंशिकी, पर्यावरण)

विकास की अवधारणा :-

     विकास का तात्पर्य मानव की अभिवृद्धि के साथ - साथ उसके शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , संज्ञानात्मक , संवेगनात्मक व्यवहार मे परिवर्तन से होता है।

स्कीनर के अनुसार :-"विकास नियमित और क्रमिक प्रक्रिया है।"

विकास की परिभाषा :- ( मनोविज्ञान मे 

मानव विकास की अवधारणा ) :-

     शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों , गुणों तथा विशेषताओं की नियमित और क्रमिक उत्पत्ति को मनोवैज्ञानिक भाषा में 'विकास'  कहा जाता है।

अरस्तू के अनुसार- "विकास आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से व्यक्ति मे परिवर्तन है।"

बाल विकास की परिभाषा :-

     स्पष्ट है कि विकास परिवर्तनों की प्रक्रिया है और इसके फलस्वरूप ही व्यक्ति के भीतर नयी - नयी विशेषताओं और क्षमताओं का जन्म होता है। यही अवधारणा बाल विकास से भी सम्बन्धित है।

हरलॉक के अनुसार - " बाल मनोविज्ञान का नाम बाल विकास इसलिए रखा गया क्योंकि विकास के अंतर्गत अब बालक के विकास के समस्त पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है , किसी एक पक्ष पर नहीं ।


क्रो और क्रो के अनुसार - बाल मनोविज्ञान  विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्वावस्था तक विकसित हो रहे मानव का अध्ययन किया जाता है "

     मानव - विकास की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं 

1. विकास की एक निश्चित प्रणाली होती है - 

       बालक का विकास एक निश्चित क्रम में होता है विकास का प्रत्येक स्तर उसके अगले तथा पिछले विकासक्रम से अनिवार्यतः प्रभावित होता है ।

      गेसेल के अनुसार - "सभी सामान्य बालकों में वृद्धि तथा विकास के लक्षण एक ही क्रम से उदय होते हैं"

2. विकास सामान्य से विशिष्ट प्रतिक्रिया की ओर होता है :

     बालक के विकास के प्रत्येक क्षेत्र में चाहे वह क्रियात्मक हो या मानसिक , उसकी प्रतिक्रियायें विशिष्ट रूप धारण करने से पूर्व सामान्य प्रकार की होती हैं । प्रारम्भ में वह सरल क्रियाओं को सामान्य ढंग से और बाद में जटिल क्रियाओं को विशिष्ट ढंग से करता है । चलना , पकड़ना , खाना , शब्द - भण्डार का निर्माण , प्रत्यक्ष - ज्ञान , संवेगात्मक अभिव्यक्ति इत्यादि में इसके प्रमाण मिलते हैं ।
     अर्थात सामान्य से विशिष्ट और सरल से जटिल और एकीकृत से क्रियात्मक स्तरों की ओर अग्रसर होने के दौरान विकास प्रगतिशील होता है।


3. विकास अविराम गति से होता है - 

    व्यक्ति का विकास एक सतत प्रक्रिया है जो गर्भाधान से आरम्भ होकर प्रौढ़ावस्था तक चलती रहती है । उसके कोई भी गुण चाहे वे शारीरिक हों अथवा मानसिक ,सहसा ही विकसित नहीं होते हैं । 
    

4. विकास की गति में तीव्रता और मन्दता पायी जाती है :-

      विकास सदैव एक गति से नहीं होता है , उसमें उतार - चढ़ाव भी पाया जाता है । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बालक एक नई क्रिया को सीखते - सीखते अपनी कुछ पुरानी क्रियाओं को दुहराने लगता है । 
     

5. विकास की गति में वैयक्तिक विषमतायें स्थायी होती हैं 

      विकास की गति में सदा एकरूपता पायी जाती है । जिन बच्चों का विकास आरम्भ में तीव्रगति से होता है , उनका विकास आगे चलकर भी उसी तरह होता है । इसके विपरीत , जिन बच्चों का प्रारम्भिक विकास मन्द गति से होता है , उनमें आगे चलकर होने वाले विकास की गति भी मन्द होती है ।

6. विकास सम्बन्धी अनेक गुण सह -सम्बन्धित होते हैं -

      वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि यद्यपि शरीर के विभिन्न भागों का विकास विभिन्न गति तथा समय पर होता है किन्तु यह भी सत्य है कि विकास का अनुपात प्रतिपूरक होता है । 

7.शरीर के विभिन्न अंगों का विकास भिन्न - भिन्न गति से  होता है - 

       शरीर के सभी भागों का विकास एक गति से नहीं होता है । उदाहरणार्थ - मस्तिष्क की परिपक्वता प्राय : छह से आठ वर्ष तक हो जाती है किन्तु उसका संगठन बाद में होता है । 

8. विकास के सम्बन्ध में भविष्यवाणी करना सम्भव है -

       बाल विकास की गति नियमित , सतत और क्रमबद्ध होती है । अत : किसी भी स्तर पर अध्ययन कर यह कहना सम्भव है कि बालक का भावी विकास किस दिशा में कैसा मोड़ ले सकता है । इसके आधार पर बच्चों को उचित शिक्षा दी जा सकती है और उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है । 

9. प्रत्येक विकासात्मक अवस्था का अपना - अपना गुण होता है — 

       प्रत्येक आयु स्तर पर कुछ गुण - विशेष अधिक तीव्रता तथा विचित्रता से विकसित होते हैं । 

फेल्डमन के अनुसार - " प्रत्येक स्तर की कुछ प्रमुख विशेषतायें तथा चारित्रिक गुण होते हैं जिससे उस स्तर की विलक्षणता , सुसंगतता तथा एकता परिलक्षित होती है ।


10. प्रत्येक व्यक्ति विकास की हर प्रमुख अवस्था से गुजरता है - 

      सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति विकास के सभी प्रमुख स्तरों से होकर गुजरता है । कुछ निम्न बौद्धिक स्तर के लोग ही इन सभी स्तरों से होकर नहीं गुजरते । अनुपयुक्त वातावरण , दुर्बल स्वास्थ्य , विकास सम्बन्धी उत्प्रेरकों का अभाव आदि के कारण भी सामान्य गति में बाधा पहुँचती है । 

11. विकास परिपक्वता और शिक्षण का परिणाम होता है 

      विकास के सम्बन्ध में यह एक प्रधान तथ्य माना जाता है कि बालक का विकास चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक परिपक्वता और शिक्षा का परिणाम होता है ।

बाल विकास के पक्ष :-

सामाजिक विकास :- 

" समाज के साथ अन्तःक्रिया द्वारा व्यक्ति का विकास "

       विकास के इस पक्ष से स्पष्ट है कि - बालक का सामाजिक दायरा जितना विस्तृत होगा उसका सामाजिक विकास उतना ही सुदृढ़ होगा।
       बालक का सामाजिक विकास उसमे सहानुभूति , सहयोग , सद्भावना , परोपकार और त्याग की भावना का संचार करता है और समाज मे उसे एक उचित स्थान देता है।
       

      समाजिक विकास से जुड़े मनोवैज्ञानिको मे 'लेव वाइगोत्सकी का सामाजिक सिद्धांत' प्रमुख है।

संज्ञानात्मक विकास :-

" किसी बिषय-वस्तु अथवा घटना को संज्ञान मे रखकर चिंतन , तर्क , प्रत्यक्षीकरण एवं समस्या समाधान के गुण स्वयं मे विकसित करना "

      संज्ञानात्मक विकास से जुड़े मनोवैज्ञानिको मे 'जीन पियाजे का संज्ञानात्मक सिद्धांत' प्रमुख है ।


संवेगात्मक विकास :-

" किसी क्रिया की प्रतिक्रिया से उत्तपन्न भाव ही संवेग है।"
सभी प्राणियों मे संवेग का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक क्रिया है। यह संवेग आन्तरिक व वाह्य दोनो कारकों पर निर्भर करता है ।
       मैक्डूगल व गिलफोर्ड ने मानव जीवन से जुड़े 14 प्रकार के संवेगो को प्रमुखता से बताया है- भय , क्रोध , घृणा , करुणा , आश्चर्य , आत्महीनता , एकाकीपन , कामुकता , भूख , अधिकार , कृतिभाव एवं आमोद ।

नैतिक विकास :-

     समाज के द्वारा बनाये गये नियमो के आधार पर आचरण करना ही नैतिकता है। नैतिक विकास अच्छे व बुरे काम की समझ पैदा करता है और समाज के साथ समन्वय स्थापित करने मे सहायता प्रदान करता है।

     नैतिक विकास के लिए 'कोहलबर्ग का नैतिक  विकास का सिद्धांत' प्रमुख है।

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बाल विकास की अवस्थाएँ - 

   विकास बहु-आयामी होता है । इसकी पाँच अवस्थाएं होती हैं।

  1. गर्भावस्था , 
  2. शैशवावस्था , 
  3. बाल्यावस्था , [पूर्व बाल्यकाल , उत्तर बाल्यकाल]
  4. किशोरावस्था और 
  5. प्रौढ़ावस्था । 

विकास के चरण :-

     उपरोक्त अवस्थाओं के आधार पर प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति के विकास को निम्नलिखित पाँच चरणों में विभाजित किया जा सकता है -
     

( 1 ) शारीरिक विकास  :-

     जैसे :- ऊंचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि आदि। शारीरिक विकास पर बालक के अनुवांशिक गुणों का प्रभाव प्रमुख होता है तथा बालक का उचित पालन-पोषण भी शारीरिक विकास को बल देता है।
     

( ) मानसिक विकास :-

      इसे संज्ञानात्मक विकास भी कहा जाता है। कल्पनाएं, विचार, स्मरण शक्ति, निरीक्षण, निर्णय लेना, समस्या-समाधान आदि इसी विकास के अन्तर्गत आते हैं।जन्म के समय बालक में यह योग्यता नहीं होती।
      

( ) सामाजिक विकास :-

      विकास के क्रम में पहली सीढ़ी परिवार को और दूसरी सीढ़ी समाज को माना गया है।बच्चा समाज से जुड़ कर अपने आत्मसम्मान, स्वाभिमान, चरित्र निर्माण आदि की समझ का विकास करता है।
      शैशवास्था में सामाजिक व नैतिक भावना का अभाव रहता है।
      

( ) संवेगात्मक विकास  :-

      भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, खुशी, आदि का विकास संवेगात्मक विकास के अन्तर्गत आता है। यह बालक के सभी विकास [बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक] को प्रभावित करता है।
      भय, क्रोध, प्रेम तथा पीड़ा नामक चार मुख्य संवेग शिशु में दो वर्ष तक विकसित हो जाते है।

( ) क्रियात्मक विकास :-

      बालक के कार्य करने की क्षमताओं, शक्तियों, व योग्यताओं आदि का विकास

     विकास के इन पाँचों पक्षों का शिक्षा की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है , क्योंकि बाल - विकास की प्रक्रिया में इनका परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध है ।

अभिवृद्धि :-

     शारीरिक वृद्धि और विकास के परस्पर सम्बन्ध को 'अभिवृद्धि' कहते हैं।
     मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अभिवृद्धि का सम्बन्ध शारीरिक संरचना के विकास से है जो एक निश्चित समय सीमा , आयु तक ही होती है।

अभिवृद्धि एवं विकास में अन्तर :-

1. अभिवृद्धि का स्वरूप बाह्य होता है , जबकि विकास आन्तरिक होता है । 

2. अभिवृद्धि मात्रात्मक परिवर्तन की द्योतक है , जबकि विकास गुणात्मक परिवर्तन का द्योतक होता है । 

3. अभिवृद्धि को प्रत्यक्षतः मापा जा सकता है , जैसे - लम्बाई को इंचों या सेंटीमीटरों में।जबकि विकास का अवलोकन व्यवहार करने के तरीके में परिवर्तन के समय किया जाता है । 

4. अभिवृद्धि केवल उन्हीं कारकों से सम्बन्धित होती है , जो बालक के जन्म के समय उसमें विद्यमान होते हैं जबकि विकास के लिए ऐसा आवश्यक नहीं रहता । 

5. अभिवृद्धि का होना सीमित होता है जबकि विकास का होना व्यापक होता है । 

6. अभिवृद्धि विशेष आयु तक चलनेवाली प्रक्रिया है , जबकि विकास जन्म से लेकर मृत्यु तक चलनेवाली प्रक्रिया है । 

7. अभिवृद्धि कुछ समय के बाद रुक जाती है जबकि विकास जीवनपर्यन्त चलता रहता है । 

8. अभिवृद्धि आकार में वृद्धि है , विकास विभेदीकरण तथा विशिष्टीकरण की प्रक्रिया है । 

9. अभिवृद्धि का स्वरूप मूलतः संरचनात्मक होता है जबकि विकास का स्वरूप मूलतः कार्यात्मक होता है । 

10. अभिवृद्धि विकास की प्रक्रिया का परिणाम है जबकि विकास स्वयं एक प्रक्रिया है । 

11. अभिवृद्धि की कोई निश्चित दिशा नहीं होती है जबकि विकास की एक निश्चित दिशा होती है । 

12. अभिवृद्धि में कोई निश्चित क्रम नहीं होता है , जबकि विकास का निश्चित क्रम होता है । 

13. शैक्षिक दृष्टि से भी अभिवृद्धि और विकास में अन्तर दृष्टिगत होता है । इस दृष्टि से अभिवृद्धि का तात्पर्य जैविक तत्परता है जबकि विकास का तात्पर्य मनोजैविक तत्परता है ।

अभिवृद्धि तथा विकास को प्रभावित करने वाले कारक :

बुद्धि :-

     हरलाॅक - " उच्च स्तर की बुद्धि, विकास को तीव्रगामी बनाने से सम्बन्धित होती है, जबकि निम्न स्तर की बुद्धि पिछड़ेपन से सम्बन्धित होती है"


लिंग :-

     बालिकाओं का शारीरिक व मानसिक विकास बालकों की अपेक्षा तीव्र गति से होता है, तथा उनमें परिपक्वता भी शीघ्र आती है।

अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ :-
     बालक के विकास पर अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का भी प्रभाव पड़ता है । पैरा - थाइरायड ग्रन्थियाँ कैलसियम को रक्त में मिलने में सहायता देती है । थाइरायड ग्रन्थि से थाइरेक्सिन नामक स्त्राव होता है जो कि शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक है । इसी प्रकार सीने में स्थित थाइमस ग्रन्थि और मस्तिष्क के पास पिनियल ग्रन्थि शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करती है।
बालकों का मातृ प्रेम का करण -- ओडिपस ग्रंथि      
 बालिकाओं का पितृ प्रेम का कारण  -- इलेक्ट्रा ग्रंथि 

विद्यालय का भौतिक वातावरण :- 

     बालक के सर्वांगीण विकास के लिये सबसे उपयुक्त स्थान विद्यालय को माना जाता है। अत: विद्यालय का परिवेश, वातावरण एवं शैक्षिक गतिविधियाँ उन्हे केन्द्र मे रखकर बनाया जाना चाहिए जिससे बच्चा सहज रुप से अपने विकास को गति दे सके।

इनके अतिरिक्त 

     पौष्टिक भोजन, शुद्ध वायु एवं प्रकाश, रोग तथा चोट, प्रजाति, संस्कृति, आनुवंशिक आदि भी वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करते हैं
वृद्धि की अवस्थाएँ :-

1. शैशवकाल :- जन्म से 2 वर्ष तक के बच्चे 

    इस अवस्था में संवेगात्मक विकास होता है तथा इस अवस्था में सीखने की क्षमता की गति तीव्र होती है ।

वैलेन्टाइन के अनुसार - शैश्वास्था सिखने का अनोखा काल है।

हरलाॅक के अनुसार - शैशवावस्था बहुत खतरनाक अवस्था है।


2. बाल्यकाल :-

     बाल्यकाल को निम्न दो भागों में विभाजित किया गया है 

पूर्व बाल्यकाल [सामान्यतया 2 से 6 वर्ष की अवस्था] :-

     इसे बालकों के स्व-केन्द्रित अवस्था माना गया है। बालकों का बाहरी जुड़ाव होने लगता है।बच्चों में(नकल करने की प्रवृत्ति) अनुकरण एवं दोहराने की प्रवृत्ति पाई जाती है । समाजीकरण एवं जिज्ञासा दोनों में वृद्धि होती है । मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह काल भाषा सीखने की सर्वोत्तम अवस्था है । 
     

उत्तर बाल्यकाल [6 से 12 वर्ष तक की अवस्था ] :-

     इस अवस्था में बच्चों में बौद्धिक , नैतिक ,सामाजिक 
तर्कशीलता इत्यादि का व्यापक विकास होता है । पढ़ने की रुचि में वृद्धि के साथ - साथ स्मरण क्षमता का भी विकास होता है । बच्चों में समूह भावना का विकास होता है अर्थात् समूह में खेलना , समूह में रहना , समलैंगिक व्यक्ति को ही मित्र बनाना (समलिंगी के प्रति आकर्षण- स्फूर्ति की अवस्था) इत्यादि । जीवन में अनुशासन तथा नियमों की महत्ता समझ में आने लगती है । खोजी दृष्टिकोण एवं घूमने की प्रवृत्ति का विकास ।

कोल व ब्रुस के अनुसार - बाल्यावस्था संवेगात्मक विकास का अनोखा काल है।


किशोरावस्था [12 से 18 वर्ष के बीच की अवस्था] :-

     यह अवस्था जटिल अवस्था मानी जाती है ; तथा साथ ही व्यक्ति के शारीरिक संरचना में परिवर्तन देखने को मिलता है । यह वह समय होता है , जिसमें बालक बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर . . . उन्मुख होता है।
     12-14 वर्ष की आयु के बीच लड़को की अपेक्षा लड़कियों की लम्बाई एवं माँसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की लम्बाई एवं माँसपेशियाँ तेजी से बढ़ती है । इस काल में प्रजनन अंग विकसित होने लगते हैं एवं उनकी काम की मूल प्रवृत्ति जाग्रत होती है । इस अवस्था में किशोर दुश्चिन्ता ( दुविधा ) एवं स्वयं से सम्बन्धित सरोकार ( मतलब ) का भाव रखते हैं ।  इस अवस्था में किशोर - किशोरियों की बुद्धि (मानसिक योग्यता) का पूर्ण विकास हो जाता है , उनकी ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है , स्मरण शक्ति बढ़ जाती है एवं उनमें स्थायित्व आने लगता है । इस अवस्था में मित्र बनाने की प्रवृत्ति तीव्र होती है एवं सामाजिक सम्बन्धों में वृद्धि होती है । 
     इस अवस्था में नशा या अपराध की ओर उन्मुख होने की अधिक सम्भावना रहती है । किशोरावस्था के शारीरिक बदलावों का प्रभाव किशोर जीवन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर पड़ता है तथा आत्मगौरव की भावना प्रबल होती है। अतः इस अवस्था में उन्हें शिक्षकों , मित्रो एवं अभिभावकों के सही मार्गदर्शन एवं सलाह की आवश्यकता पड़ती है ।

स्टेनले हाॅल के अनुसार - किशोरावस्था प्रबल तुफान की अवस्था है।


युवावस्था  [ सामान्यतया 18 से 40 वर्ष तक ] :-

      किशोरावस्था एवं प्रौढ़ावस्था ( Adulthood ) की कोई निश्चित उम्र नहीं होती | यह अवस्था मानव - विकास में एक निश्चित परिपक्वता ग्रहण करने से प्राप्त होती है ।

 प्रौढ़ावस्था [ 40 से 65 वर्ष की अवस्था ] :-

     शारीरिक विकास में गिरावट आने लगती है अर्थात् बालों का सफेद होना , माँसपेशियों में ढीलापन तथा चेहरे पर झुर्रियाँ आना इत्यादि । 

[ 65 से अधिक वर्ष की अवस्था ] :-
     शारीरिक क्षमता का कमजोर होना । सामाजिक , आध्यात्मिक , धार्मिक तथा सांस्कृतिक क्रियाकलापों के प्रति रुझान ।

बाल विकास के सिद्धांत :-

1. विकास की दिशा का सिद्धान्त - 

     इस सिद्धान्त के अनुसार शिशु के शरीर का विकास सिर से पैर की दिशा में होता है । मनोवैज्ञानिकों ने इस विकास को मस्तकाधोमुखी या ' शिरःपुच्छीय दिशा ' कहा है । जिसके अनुसार पहले शिशु का सिर , फिर धड़ और बाद में हाथ - पैरों का विकास होता है । 

2. निरन्तर विकास का सिद्धान्त - 

      विकास एक समान गत से नहीं होता , बल्कि अविराम गति से निरन्तर चलता रहता है । विकास की गति कभी तेज , कभी धीमी रहती है । 

स्किनर के अनुसार -विकास प्रक्रियाओं की निरन्तरता का सिद्धान्त केवल इस तथ्य पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई आकस्मिक परिवर्तन नहीं होता है । "


3. विकास की गति में व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धान्त -

      एक ही आयु के दो बालकों में शारीरिक , मानसिक , सामाजिक विकास में वैयक्तिक विभिन्नताएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं 

4. विकास - क्रम का सिद्धान्त - 

     इस सिद्धान्त के अनुसार विकास एक व्यवस्थित तथा निश्चित क्रम से होता है । बालक का गामक अर्थात् गति सम्बन्धी और भाषा सम्बन्धी विकास एक क्रम में होता है । मनोवैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों से यह सिद्ध कर दिया है कि 
"  जन्म के समय शिशु केवल रोता है , तीसरे माह से वह गले से एक विशेष प्रकार की आवाज निकालता है , छठे माह से आनन्दध्वनि ( खिलखिला कर हँसना ) और सातवें माह से वह ' पा ' , ' बा ' , ' मा ' , ' दा ' आदि शब्दों को बोलने का प्रयत्न करने लगता है ।"

बालकों की आयु व उनके शब्द भण्डार

5. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त  - 

     बालक के शारीरिक , मानसिक , संवेगात्मक पक्ष के विकास में परस्पर सम्बन्ध होता है । शारीरिक विकास के साथ - साथ उसकी रुचि , ध्यान तथा व्यवहार में परिवर्तन होता जाता है और इस प्रकार उसका गामक तथा भाषा सम्बन्धी विकास होता है । शारीरिक विकास बौद्धिक विकास को प्रभावित करता है । 

गैरीसन तथा अन्य के अनुसार - " शरीर सम्बन्धी दृष्टिकोण व्यक्ति के विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर सम्बन्ध पर बल देता है ।"


6. समान प्रतिमान का सिद्धान्त - 

     इस सिद्धान्त के अनुसार मानवजाति के शिशुओं के विकास का प्रतिमान एक ही है अर्थात् उनके विकास में किसी प्रकार का अन्तर नहीं होता ।

 हरलॉक के अनुसार - प्रत्येक जाति , चाहे वह पशु जाति हो या मानव जाति , अपनी जाति के अनुरूप विकास के प्रतिमान का अनुसरण करती है ।" 


7. सामान्य से विशिष्ट प्रतिक्रियाओं का सिद्धान्त - 

     विकास के सभी पक्षों में बालक पहले सामान्य प्रतिक्रिया और बाद में विशिष्ट प्रतिक्रिया करता है अर्थात् सामान्य प्रतिक्रियाओं से वह विशिष्ट प्रतिक्रिया की ओर बढ़ता है । 

हरलॉक का कथन है- " विकास की सब अवस्थाओं में बालक की प्रतिक्रियाएँ विशिष्ट बनने से पूर्व सामान्य प्रकार की होती हैं ।"


8. वंशानुक्रम व वातावरण का अंतःक्रिया का सिद्धान्त -

      बालक का विकास वंशानुक्रम तथा वातावरण के अन्त : क्रिया के कारण होता है ।

स्किनर कै अनुसार - " वंशानुक्रम उन सीमाओं को निश्चित करता है , जिनके आगे बालक का विकास नहीं किया जा सकता है । इसी प्रकार जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में दूषित वातावरण , गम्भीर रोग , जन्मजात योग्यताओं को कुण्ठित या निर्बल बना सकते हैं । " 

वंशानुक्रम की परिभाषा :- (आनुवांशिकता)

    माता-पिता व अपने पूर्वजों से स्थानांतरित गुण अपने मे लेकर आना वंशानुक्रम या आनुवांशिकता कहलाता है।

जेम्स ड्रेवर के अनुसार - शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का माता - पिता से सन्तानों में हस्तान्तरण होना आनुवंशिकता कहलाता है । " 


एच ए पेटरसन एवं वुडवर्थ के अनुसार - व्यक्ति अपने माता - पिता के माध्यम से पूर्वजों की , जो विशेषताएँ प्राप्त करता है , उसे वंशानुक्रम कहते हैं । "


पर्यावरण (वातावरण) का अर्थ एवं परिभाषा :- 

एनास्टैसी के अनुसार - पर्यावरण वह हर चीज है , जो व्यक्ति के जीवन के अलावा उसे प्रभावित करती है।" 


जिसबर्ट के अनुसार - " जो किसी एक वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है वह पर्यावरण होता है । " 


हॉलैण्ड एवं डगलास के अनुसार - "प्राणियों के विकास , परिपक्वता , प्रकृति , व्यवहार तथा जीवन शैली को प्रभावित करने वाले बाह्य समस्त शक्तियों , परिस्थितियों तथा घटना को पर्यावरण में सम्मिलित किया जाता है और उन्हीं की सहायता से पर्यावरण का वर्णन किया जाता है । "

आनुवंशिकता एवं पर्यावरण का शैक्षिक महत्त्व :-

      विकास की वर्तमान विचारधारा में प्रकृति और पालन - पोषण दोनों को महत्त्व दिया गया है ।
◆ बालक के सम्पूर्ण व्यवहार की सृष्टि , वंशानुक्रम और वातावरण की अन्तःक्रिया द्वारा होती है । 
◆ शारीरिक , मानसिक , संवेगात्मक , सामाजिक , सभी प्रकार के विकासों पर आनुवंशिकता एवं वातावरण का प्रभाव पड़ता है । यही कारण है कि बालक की शिक्षा भी इससे प्रभावित होती है । अत : बच्चे के बारे में इस प्रकार की जानकारियाँ उसकी समस्याओं के समाधान में शिक्षक की सहायता करती हैं ।
◆ शारीरिक विकास मानसिक विकास से जुड़ा है और जिसका मानसिक विकास अच्छा होता है , उसकी शिक्षा भी अच्छी होती है ।
◆ बौद्धिक क्षमता के लिए सामान्यत : वंशानुक्रम ही जिम्मेदार होता है । इसलिए बालक को समझने के लिए इन दोनों कारकों को समझना आवश्यक है । 
◆ विद्यालयों में कई प्रकार की अनुशासनहीनता के लिए काफी हद तक वंशानुक्रम भी जिम्मेदार होता है ; जैसे - चोरी करना , अपराध में लिप्त रहना , झूठ बोलना आदि अवगुणों के विकास में बालक के परिवार एवं उसके वंशानुक्रम की भूमिका अहम होती है । 
◆ बालक की रुचियाँ , प्रवृत्तियाँ तथा अभिवृत्ति आदि के विकास के लिए भी वातावरण अधिक जिम्मेदार होता है लेकिन वातावरण के साथ यदि वंशानुक्रम भी ठीक है , तो इसको सार्थक दिशा मिल जाती है ।
◆ आनुवंशिकी एवं वातावरण के बालक के विकास पर पड़ने वाले प्रभावों के ज्ञान के अनुरूप शिक्षक विद्यालय के वातावरण को बच्चों के लिए उपयुक्त बनाता है , जिससे छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन किया जा सके एवं शिक्षण - अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके ।

◆ संज्ञानात्मक विकास के परिणामस्वरूप बालक अपने निरन्तर बदलते हुए वातावरण मे ठीक प्रकार समायोजन करने मे सक्षम हो पाता है।

प्रमुख बिन्दु


◆ मानव का विकास उसकी वृद्धि तथा वातावरण से मिलने वाली परिपक्वता पर निर्भर होता है।

◆ बालक के शारीरिक व मानसिक विकास के अन्तर्सम्बन्धों के अनुकूल पाठ्यचर्या सर्वाधिक उपयुक्त होती है।

◆ शारीरिक विकास छोटे बच्चों मे मानसिक व संज्ञानात्मक विकास मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।

◆ शिक्षण की विभिन्न विधियों के प्रयोग के लिये बाल्यावस्था को सबसे उपयुक्त माना गया है।

◆ यौन सम्बन्धी समस्या किशोरों की सबसे नाजुक एवं संवेदनशील समस्या है।

◆ शैशवावस्था से ही बालकों के सार्थक अधिगम की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।

◆ 6 से 11 वर्ष की अवस्था परवर्ती बाल्यावस्था के अन्तर्गत आता है।

◆ विकास के सिद्धांत शिक्षार्थियों की भिन्न अधिगम शैलियों को प्रभावी रुप से समझने मे शिक्षक की सहायता करता है।

◆ बालक के सम्पूर्ण व्यवहार की सृष्टि आनुवांशिक और वातावरण की अन्त: क्रिया द्वारा होती है।

◆ बालक को जो मूल प्रवृत्तियां वंशानुक्रम से प्राप्त होती हैं उनका विकास वातावरण मे होता है।

◆ बालक के सम्यक विकास के लिए उसके वंशानुक्रम और वातावरण का संयोग अत्यंत आवश्यक है।

◆ बच्चे उसी वातावरण मे बेहतर सीख सकते हैं जहाँ उनके अनुभवों एवं भावनाओं को उचित स्थान मिले।

◆एक शिक्षक के द्वारा बालक के परिवेश मे सुधार कर उसके आनुवांशिकता द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर सर्वोत्तम विकास किया जा सकता है।

◆ प्रकृति पोषण विवाद आनुवंशिकी एवं वातावरण से सम्बन्धित है।

◆ प्रकृति-पोषण विवाद मे प्रकृति का तात्पर्य जैविकीय विशिष्टताओं (वंशानुक्रम सुचनाएं) से है

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