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Best CTET Hindi notes 2020 for prepration

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CTET Hindi notes 2020 :-  इस संस्करण मे (CTET Hindi notes 2020 ) शिक्षक पात्रता परीक्षा को ध्यान मे रखते हुए हिन्दी विषय से जुड़े सारे पाठ्यक्रम को सुनियोजित एवं क्रमबद्ध तरीके से संकलित किया गया है ।CTET Hindi notes 2020 (Why is it important) :-  परीक्षा की दृष्टि से किसी भी विषय की तैयारी के लिए आवश्यक है एक उचित माध्यम, जहाँ विषय सम्बन्धित सभी तथ्य व महत्वपूर्ण बिन्दु मिल सके एवं उनकी तैयारी सरल व सहज तरीक़े से हो सके B. B. Education (CTET Hindi notse 2020 के माध्यम से) आपकी इन्हीं आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए वचनबद्ध है।
CTET Hindi notes 2020 (What is in it) :- B.B. Education द्वारा तैयार किये गये सारे CTET Hindi notes 2020 व्यक्तिगत अनुभव, छात्र, शिक्षक, पाठ्यक्रम, एवं महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान मे रखकर बनाया गया है ।इसमें Hindi Pedagogy, Hindi language, and NCERT Class notes को आसान एवं सरल तरीक़े से बताया एवं समझाया गया है।
CTET Hindi notes 2020 (Specialty) :- Previous year exam के प्रशनों को अलग - अलग कर उसे अध्यायवार सम्मलित किया गया है ।             जैसे :- यदि आप CTET Hindi no…

लेव वाइगोत्सकी का सामाजिक विकास का सिद्धांत

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लेव वाइगोत्सकी का सामाजिक विकास का सिद्धांत :-     रुसी मनोवैज्ञानिक लेव वाइगोत्सकी का सामाजिक विकास का सिद्धांत बालक का समाज के साथ अन्त: क्रिया द्वारा अर्जित अधिगम पर निर्भर है । लेव वाइगोत्सकी का मत था कि -"बालक में पहले सामाजिक अधिगम होता है, उसके पश्चातू विकास" ।यह मत जीन पियाजे के विचारों के विपरीत है। जीन पियाजे का मत था कि -"बालक में पहले विकास होता है, उसके बाद वह अधिगम की ओर उन्मुख होता है " ।     वाइगोत्सकी का मानना था की बालक को समाज में  जिस प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध होंगी , उसका विकास भी उसी प्रकार का होगा। बालकों की अवस्था व उनका सामाजिक विकास :-शैशवास्था :-     • जन्म के समय शिशु में सामाजिकता का अभाव होता है।     • वह स्वार्थी प्रवृत्ति का होता है ।     • माता-पिता का व्यवहार उसके आगे के सामाजिक विकास के लिए जिम्मेदार होते हैं । बाल्यावस्था :-    • बाल्यावस्था में बालक का सामाजिक परिवेश विस्तृत हो जाता है, वह विद्यालय जाना प्रारम्भ कर देता है।     • बालक इस अवस्था मे समाज से अन्तःक्रिया करके सीखना प्रारम्भ कर देता है ।     • अपने किये गये कार्यों के लिए प्…

लाॅरेन्स कोह्लबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत

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कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत :-     कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत जीन पियाजे के संज्ञानात्मकविकास के सिद्धांत से प्रेरीत है । कोहलबर्ग ने बालको के नैतिक विकास को उनकी अवस्थाओं के आधार पर विभाजित किया है ।
Click 👇 [जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत]
कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत की पृष्ठभूमि :-     कोहलबर्ग ने लगभग 20 वर्षों तक बच्चों के साथ एक विशेष प्रकार के साक्षात्कार विधी का प्रयोग करने के बाद नैतिक विकास की अवस्थाओं को छः चरणों मे विभाजित किया है । साक्षात्कार की प्रक्रिया से पूर्व कोहलबर्ग बच्चों को कहानियाँ सुनाते थे और फिर उसी से सम्बंधित प्रश्नों को साक्षात्कार का आधार बनाते थे । कोहलबर्ग ने इस प्रक्रिया के लिए लगभग 11 कहानियों का चयन किया था जिसमे हाइनज की कहानी प्रमुख थी । कोहलबर्ग के नैतिक विकास की अवस्थाएं :-     कोहलबर्ग के मतानुसार बच्चों में नैतिक मूल्यों के विकास के लिए आवश्यक है कि उन्हें नैतिक मुद्दो पर आधारित चर्चाओं में शामिल किया जाये । उन्होंने बताया कि बालको मे नैतिकता या चरित्र के विकास की कुछ निश्चित एवं सार्वभौमिक अवस्थायें पायी जा…

बालमनोवैज्ञानिक जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत ( for examination )

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जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत :-     स्वीटजरलैंड के मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे संज्ञानात्मक विकास के क्षेत्र में अकेले व्यक्ति हैं , जिन्होंने 50 वर्षो से अधिक समय तक बच्चों के व्यवहार का सुक्ष्मतापूर्वक प्रेक्षण और विश्लेषण करते रहने के बाद संज्ञानात्मक विकास की अवधारणा से सम्बन्धित नियमो और सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। [बालमनोविज्ञान से जुड़े मनोवैज्ञानिक व उनके सिद्धांत] संज्ञानात्मक विकास की अवधारणा :-      " संज्ञानात्मक विकास उन मानसिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित है जिसके द्वारा व्यक्ति उद्दीपकों के विषय में ज्ञान प्राप्त करता है अथवा अपने परिवेश को जान पाता है ।        " संज्ञानात्मक विकास का मुख्य तत्व संज्ञान है । कल्पना , तर्क , चिन्तन ,प्रत्यक्षीकरण आदि संज्ञानात्मक क्रियाएँ बौद्धिक क्षमता के विकास के लिए आधार का काम करती है इन क्रियाओं के कारण ही बालक में संज्ञानात्मक क्षमता का विकास होता है । संज्ञानात्मक विकास के संम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों का दृष्टिकोण :-     बालक में संज्ञानात्मक क्षमता का विकास कैसे होता है- इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के दो दृष्टिकोण…

नई शिक्षा नीति 2020- भारत की शिक्षा का आधुनिकीकरण व विस्तार

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नई शिक्षा नीति 2020 :-       34 सालों बाद देश की नई शिक्षा नीति बड़े बदलाव के साथ दिनाङक् 29 जुलाई 2020 को मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा देश के समक्ष प्रस्तुत किया गया।        कहते हैं -" यदि किसी देश को बदलना है तो उस देश की शिक्षा नीति बदल दो।" अर्थात किसी देश की दशा व दिशा उस देश की शिक्षा पर ही आधारित होती है। नई शिक्षा नीति की आवश्यकता :-       समय के साथ-साथ वक्त की आवश्यकताओं के अनुरुप प्रत्येक देश की शिक्षा नीतियों में बदलाव की आवश्यकता होती है। यही बदलाव आने वाले समय में देश और समाज के विकास और भविष्य का निर्धारण करते हैं।        भारत देश मे यह बदलाव 34 वर्षो बाद किया गया है जिसके लिए अभी सिर्फ यही कहा जा सकता है कि - "देर आये दुरुस्त आये"
नई शिक्षा नीति की रुपरेखा :-      नई शिक्षा नीति मौजुदा भाजपा सरकार के 2014 चुनाव के घोषणापत्र का एक प्रमुख हिस्सा था। इसी घोषणा को आगे बढ़ाते हुए 31 अक्टूबर 2015 को पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक 5 सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया।       इस कमेटी ने 27 मई 2016 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी। इस…

मनोविज्ञान के सिद्धान्त - प्रतिपादक/जनक - Child devlopment

मनोविज्ञान के सिद्धान्त तथा उनके प्रतिपादक/जनक :-     मनोविज्ञान के सिद्धांत के अन्तर्गत इस पृष्ठ मे हम  बाल मनोविज्ञान से जुड़े प्रमुख सिद्धांत एवं उनके प्रतिपादक के बारे मे जानेंगे ।  मनोविज्ञान की परिभाषा :-     मनोविज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमे समस्त प्राणी  जगत के मानसिक, समाजिक व व्यवहारिक पक्षो का क्रमबद्ध तरीके से अध्ययन किया जाता है।
मनोविज्ञान का अध्ययन प्लेटो ने 427- 347 bc मे आरम्भ किया था जिसको पूर्ण करने का काम अरस्तु ने किया।
गेस्टाल्टवाद             ★ कोहलर, कोफ्का                                          वर्दीमर व लेविनसंरचनावाद              ★ विलियम वुंटव्यवहारवाद             ★ जे. बी. वाटसनमनोविश्लेशणवाद     ★ सिगमंड फ्रायडसंबंधवाद                 ★ थार्नडाईकमानवतावादी            ★ मैस्लोविकास के सामाजिक प्रवर्तक ★ एरिक्सन
◆ थार्नडाइकसीखने के नियमशिक्षा-मनोविज्ञान के जनकप्रयास एवं त्रुटि सिद्धांत प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांतसंयोजनवाद का सिद्धांतउद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धांतS-R थ्योरी के जन्मदाताअधिगम का बन्ध सिद्धांतसंबंधवाद का सिद्धांतप्रशिक्षण अंतरण का सर्वसम अवयव …

विकास की अवधारणा-(बाल विकास, विकास के सिद्धांत, अभिवृद्धि, आनुवंशिकी, पर्यावरण)

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विकास की अवधारणा :-विकास का तात्पर्य मानव की अभिवृद्धि के साथ - साथ उसके शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , संज्ञानात्मक , संवेगनात्मक व्यवहार मे परिवर्तन से होता है।
स्कीनर के अनुसार :-"विकास नियमित और क्रमिक प्रक्रिया है।"विकास की परिभाषा :- ( मनोविज्ञान मे मानव विकास की अवधारणा ) :-     शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों , गुणों तथा विशेषताओं की नियमित और क्रमिक उत्पत्ति को मनोवैज्ञानिक भाषा में 'विकास'  कहा जाता है।
अरस्तू के अनुसार-"विकास आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से व्यक्ति मे परिवर्तन है।"बाल विकास की परिभाषा :-     स्पष्ट है कि विकास परिवर्तनों की प्रक्रिया है और इसके फलस्वरूप ही व्यक्ति के भीतर नयी - नयी विशेषताओं और क्षमताओं का जन्म होता है। यही अवधारणा बाल विकास से भी सम्बन्धित है।
हरलॉक के अनुसार - " बाल मनोविज्ञान का नाम बाल विकास इसलिए रखा गया क्योंकि विकास के अंतर्गत अब बालक के विकास के समस्त पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है , किसी एक पक्ष पर नहीं । " 
क्रो और क्रो के अनुसार -“ बाल मनोविज्ञान  विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्वावस्था …